सोयाबीन में जड़ सड़न रोग | कैसे पहचानें और मानसून में कैसे बचाएं अपनी फसल
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सोयाबीन में जड़ सड़न रोग (Root Rot Disease) मानसून के मौसम में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाला बीमारी है। यह रोग Rhizoctonia solani, Fusarium और Phytophthora नाम के मिट्टी में रहने वाले फफूंद से होता है। बारिश के कारण जब खेत में पानी भर जाता है और मिट्टी गर्म रहती है तब ये फफूंद जड़ों पर हमला करते हैं। पौधे पीले पड़ने लगते हैं, मुरझा जाते हैं और अंत में मर जाते हैं। सही समय पर बीजोपचार और फफूंदनाशक दवाई का उपयोग करने से 60–70% तक रोग को रोका जा सकता है।
सोयाबीन में जड़ सड़न रोग क्या है?
जड़ सड़न रोग एक मिट्टी जनित फफूंद रोग है जो सोयाबीन की जड़ों को अंदर से नष्ट करता है। यह रोग हवा से नहीं फैलता ये फफूंद मिट्टी में और पुरानी फसल के अवशेषों में रहते हैं। मानसून में जब मिट्टी गर्म और गीली होती है, तब ये फफूंद तेजी से फैलते हैं।
भारतीय सोयाबीन खेतों में यह रोग अकेला नहीं आता आमतौर पर तीन फफूंद मिलकर हमला करते हैं:
- Rhizoctonia solani : अंकुरण के समय पौधों को गिरा देता है। पौधे की जड़ का निचला हिस्सा भूरा-काला हो जाता है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और विदर्भ में सबसे ज्यादा पाया जाता है।
- Fusarium species : जड़ों को भूरा और काला कर देता है। पहले से कमज़ोर या जलभराव से तनावग्रस्त पौधों पर ज्यादा हमला करता है।
- Phytophthora sojae : "वाटर मोल्ड" है बाढ़ और जलभराव में बिजली की रफ्तार से फैलता है। भारी बारिश के बाद नर्सरी उम्र के पौधों को तेज़ी से मारता है।
सोयाबीन में जड़ सड़न के लक्षण : हर अवस्था में क्या दिखता है
जड़ सड़न रोग की पहचान जल्दी करना ज़रूरी है। जब ऊपर से लक्षण दिखने लगते हैं तब तक जड़ें 40–60% तक सड़ चुकी होती हैं। हर अवस्था में ध्यान से देखें:
| फसल की अवस्था | ऊपर से क्या दिखता है | जड़ में क्या होता है | कौन सा फफूंद |
|---|---|---|---|
| अंकुरण से पहले (0–7 दिन) | बीज उगते ही नहीं, खेत में जगह-जगह खाली जगह | बीज मिट्टी में ही सड़ गए, मुलायम और काले | Pythium / Phytophthora |
| अंकुरण (7–21 दिन) | नए पौधे अचानक गिर जाते हैं; जड़ के पास तना पानी जैसा दिखता है फिर काला पड़ जाता है | जड़ का निचला हिस्सा नरम, भूरा-काला; पौधा आसानी से उखड़ जाता है | Rhizoctonia / Phytophthora |
| वानस्पतिक (V2–V5) | कुछ पौधे पीले पड़ने लगते हैं; नीचे की पत्तियाँ हल्की; बगल के पौधों से छोटे | पार्श्व जड़ें सड़ी हुई; मुख्य जड़ भूरी या काली | Fusarium / Rhizoctonia |
| फूल आने पर (R1–R3) | भारी बारिश के बाद अचानक मुरझाना; पत्तियाँ पीली-भूरी होकर गिरती हैं | जड़ें पूरी तरह सड़ी; तना काटने पर अंदर भूरा दिखता है | Fusarium / Phytophthora |
| फली भरते समय (R4–R6) | पौधे मर रहे हैं; फलियाँ खाली या सूखी; बहुत कम दाने | जड़ें पूरी तरह नष्ट; कोई सक्रिय जड़ नहीं बची | मिश्रित फफूंद |
जड़ सड़न क्यों होता है मानसून में कौन से हालात इसे बढ़ाते हैं
ये फफूंद मिट्टी में हमेशा मौजूद रहते हैं। लेकिन नुकसान तभी होता है जब कुछ खास हालात एक साथ बन जाते हैं। जुलाई–सितंबर में भारतीय सोयाबीन खेतों में ये हालात अपने आप आते हैं:
- खेत में पानी भरना: मिट्टी में ऑक्सीजन खत्म हो जाती है। जड़ें कमज़ोर पड़ती हैं। Phytophthora और Pythium पानी में तेज़ी से फैलते हैं।
- मिट्टी का तापमान 25–32°C: Rhizoctonia और Fusarium के लिए यह सबसे अनुकूल तापमान है। मानसून में भारतीय मिट्टी का तापमान इसी दायरे में रहता है।
- काली मिट्टी (Vertisols): मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और विदर्भ की काली चिकनी मिट्टी में पानी रुकता है। इन क्षेत्रों में जड़ सड़न सबसे गंभीर रूप लेता है।
- लगातार सोयाबीन की खेती: एक ही खेत में 3–4 साल लगातार सोयाबीन बोने से मिट्टी में फफूंद की तादाद बढ़ती जाती है खासकर Fusarium की।
- पुरानी फसल के अवशेष: पिछले साल का सोयाबीन का ठूंठ खेत में छोड़ने से उसमें Rhizoctonia के स्क्लेरोशिया और Fusarium के बीजाणु जीवित रहते हैं और अगली फसल को संक्रमित करते हैं।
- ज्यादा गहरी बुवाई: 4 सेमी से ज्यादा गहराई में बोया बीज देर से उगता है और इस दौरान मिट्टी में फफूंद का सामना ज्यादा देर तक करना पड़ता है।
जड़ सड़न रोग से सोयाबीन को कितना नुकसान होता है?
जड़ सड़न एक "चुप्पे हत्यारे" की तरह काम करता है। जब ऊपर से लक्षण दिखते हैं तब तक 40–60% जड़ें बर्बाद हो चुकी होती हैं। इससे पैदावार पर सीधा असर पड़ता है:
- खेत में जगह-जगह खाली जगह बोए हुए बीज से कम पौधे उगते हैं
- संक्रमित पौधे 30–40% छोटे रहते हैं कम शाखाएं, कम फलियाँ
- फली भरने के समय पोषण नहीं मिलता छोटे और सिकुड़े हुए दाने
- नीचे वाली जगहों में 80–100% पौधे मर सकते हैं जहाँ पानी भरता है
- सामान्य मानसून में 15–25% और भारी बारिश के साल में 40–60% तक पैदावार घट सकती है
सोयाबीन में जड़ सड़न रोग का पूरा उपाय : क्या करें, कब करें
स्टेप1 बुवाई से पहले खेत की तैयारी
- फसल चक्र अपनाएं: एक ही खेत में 2 साल से ज्यादा सोयाबीन न लगाएं। गेहूं, ज्वार या मक्का के साथ बदल-बदलकर लगाएं।
- गर्मी की गहरी जुताई: अप्रैल–मई में 25–30 सेमी गहरी जुताई करें। तेज़ धूप से Rhizoctonia और Fusarium के बीजाणु मर जाते हैं।
- पानी निकासी की व्यवस्था: बुवाई से पहले मेड़-नाली (BBF) बनाएं। काली मिट्टी में जलनिकास सबसे ज़रूरी कदम है।
- पुराने अवशेष हटाएं: पिछले साल का सोयाबीन का डंठल जलाएं या गहरे दबाएं खेत में खुला न छोड़ें।
- प्रमाणित बीज लें: जिस खेत में पिछले साल जड़ सड़न हुई हो उससे बीज न लें।
स्टेप 2 बीजोपचार (सबसे ज़रूरी कदम कभी न छोड़ें)
बीजोपचार सबसे सस्ता और सबसे असरदार तरीका है। उपचारित बीज जब मिट्टी में जाता है उसी पल से सुरक्षित रहता है। बिना उपचार का बीज संक्रमित मिट्टी में असहाय होता है।
तीन उत्पाद तीनों का अलग-अलग काम है। एक ही क्रम में लगाएं:
Krishikranti Susafe Carbendazim 12% + Mancozeb 63% WP
बीजोपचार मात्रा: 2 ग्राम प्रति किलो बीज
Carbendazim अंदर से Rhizoctonia और Fusarium को मारता है। Mancozeb बाहर से संपर्क सुरक्षा देता है। बीज पर अच्छी तरह लगाएं छाँव में 30 मिनट सुखाएं फिर बुवाई करें।
Krishikranti Suvistin Carbendazim 50% WP
बीजोपचार मात्रा: 2 ग्राम प्रति किलो बीज
शुद्ध प्रणालीगत (Systemic) फफूंदनाशक। अंकुरण के समय बीज के अंदर घुसकर Rhizoctonia और Fusarium को खत्म करता है इससे पहले कि लक्षण दिखें। Susafe के साथ या अलग से उपयोग करें।
Krishikranti Pseudomonas Fluorescens Bio-Fungicide Powder
बीजोपचार मात्रा: 10 ग्राम प्रति किलो बीज
रासायनिक उपचार के बाद लगाएं। Pseudomonas fluorescens जड़ क्षेत्र में बस जाता है और प्राकृतिक एंटीफंगल यौगिक बनाता है जो पूरे सीज़न Rhizoctonia और Fusarium को दबाए रखता है। मिट्टी की सेहत के लिए भी फायदेमंद।
स्टेप 3 खड़ी फसल में रोग दिखे तो क्या करें
अगर बुवाई के बाद खेत में पौधे पीले पड़ रहे हैं, मुरझा रहे हैं या उखड़ने लगे हैं तो एक दिन भी इंतज़ार न करें। जितनी देर होगी, रोग उतना फैलेगा।
- पहला काम खेत में पानी निकालें जलभराव रहते हुए कोई भी दवाई काम नहीं करेगी। पहले नाली बनाकर पानी बाहर निकालें। यह सबसे ज़रूरी पहला कदम है।
- पहला छिड़काव रोग दिखते ही (Susafe मिट्टी में डालें) Krishikranti Susafe को 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलें। प्रभावित पौधों की जड़ के आसपास 200–300 मिली घोल डालें (ड्रेंच करें)। सिर्फ पत्तियों पर छिड़काव से काम नहीं होगा दवाई जड़ तक पहुंचनी चाहिए।
- प्रभावित हिस्से के आसपास भी डालें जहाँ बीमारी दिख रही है, उसके 2–3 मीटर के दायरे में भी घोल डालें। जड़ सड़न पानी के साथ फैलता है बफर ज़ोन ज़रूरी है।
- दूसरा छिड़काव 10–12 दिन बाद (Pseudomonas जैविक सुरक्षा) Krishikranti Pseudomonas Fluorescens Bio-Fungicide को 1 किलो प्रति एकड़ पानी में मिलाकर मिट्टी में डालें। यह जड़ क्षेत्र में लाभकारी बैक्टीरिया की संख्या बढ़ाता है और बचे हुए फफूंद को दबाता है।
स्टेप 4 पौधे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाएं
स्वस्थ और अच्छी तरह पोषित पौधे जड़ सड़न से ज्यादा लड़ सकते हैं। मानसून में पोटाश और कैल्शियम पोषण से पौधे की कोशिका भित्ति मज़बूत होती है। अगर खेत में लोहे (Iron) या जस्ते (Zinc) की कमी है तो पौधा फफूंद हमले के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाता है।
अगले साल जड़ सड़न से कैसे बचें : रोकथाम के उपाय
- हर साल बुवाई से पहले बीजोपचार करें — यह अकेला कदम उच्च जोखिम वाले खेतों में भी 60–70% रोग रोक देता है
- रोग सहनशील किस्में चुनें MACS 1407, JS 9305 और NRC 7 भारतीय परिस्थितियों में जड़ सड़न के प्रति बेहतर सहनशीलता दिखाते हैं
- मानसून से पहले मेड़-नाली बनाएं खेत की जलनिकासी किसी भी दवाई से ज्यादा ज़रूरी है
- गोबर की खाद डालें बुवाई से पहले 4–5 टन प्रति एकड़ अच्छी सड़ी गोबर खाद डालने से मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीव बढ़ते हैं जो फफूंद को दबाते हैं
- हर 7–10 दिन में खेत देखें जुलाई–अगस्त में नियमित निरीक्षण करें। जल्दी पकड़े = ज्यादा फसल बची
किसानों के सवाल : जड़ सड़न रोग के बारे में
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